लेखक : अनूप कुमार मिश्रा । पत्रकार सत्ता
भारतीय संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है। यहां देश की नीतियां बनती हैं, जनता की आवाज उठती है और सरकार से जवाब मांगा जाता है। ऐसे में संसद की गरिमा, कार्यक्षमता और उत्पादकता पर गंभीर बहस जरूरी है। सवाल यह है कि यदि मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में ही बार-बार हंगामा, नारेबाजी, व्यवधान और कार्यवाही स्थगित होने की स्थिति बनती रहती है, तो सांसदों की संख्या बढ़ाने से क्या संसद अधिक प्रभावी हो पाएगी?
हालिया मानसून सत्र में भी संसद की कार्यवाही को लेकर कई सवाल उठे। कई महत्वपूर्ण विधेयक पर्याप्त चर्चा के बिना पारित हुए और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच टकराव के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई। ऐसी स्थिति में सबसे पहले यह विचार होना चाहिए कि संसद में बहस, संवाद और जवाबदेही को कैसे मजबूत किया जाए। सांसदों की संख्या बढ़ाना इस समस्या का स्वतः समाधान नहीं हो सकता।
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परिसीमन के बाद लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने की संभावनाओं को लेकर भी बहस जारी है। जनसंख्या में वृद्धि को प्रतिनिधित्व के विस्तार का आधार माना जा सकता है, लेकिन इसके साथ संसद की कार्यक्षमता, सदस्यों को मिलने वाला बोलने का समय, प्रश्नकाल, शून्यकाल और संसदीय संसाधनों पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ का भी आकलन होना चाहिए। यदि सदस्यों की संख्या बढ़ती है और सदन का समय उसी अनुपात में नहीं बढ़ता, तो अनेक सांसदों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएगा।
महिला आरक्षण भी इसी बहस से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। यदि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में अधिक प्रतिनिधित्व देना लक्ष्य है तो यह लोकतांत्रिक दृष्टि से स्वागत योग्य है। लेकिन महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए संसद की कुल सदस्य संख्या बढ़ाना ही एकमात्र रास्ता है, इस पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा होनी चाहिए। प्रतिनिधित्व और कार्यक्षमता के बीच संतुलन कायम करना आवश्यक है।
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अमेरिका के हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का उदाहरण भी इस बहस में सामने आता है। वहां प्रतिनिधि सभा की सदस्य संख्या लंबे समय से 435 पर स्थिर है। भारत अमेरिका की व्यवस्था की हूबहू नकल नहीं कर सकता, क्योंकि दोनों देशों की संवैधानिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। फिर भी यह उदाहरण इस सवाल पर विचार करने का अवसर देता है कि क्या प्रतिनिधित्व बढ़ाने के साथ-साथ सांसदों और मतदाताओं के बीच बेहतर संपर्क के लिए आधुनिक तकनीक, स्थानीय समितियों और विकेंद्रीकृत व्यवस्था का उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है।
भारत में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। यदि ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और स्थानीय संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार, संसाधन और प्रशासनिक क्षमता मिले तो स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो सकता है। इससे सांसदों पर अनावश्यक स्थानीय दबाव कम होगा और वे राष्ट्रीय नीतियों, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और व्यापक विकास के मुद्दों पर अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेंगे।
सांसदों की संख्या बढ़ाने के साथ वित्तीय भार का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। नए सांसदों के लिए आवास, कार्यालय, कर्मचारियों, सुरक्षा, यात्रा और अन्य संसदीय सुविधाओं की व्यवस्था करनी होगी। इसलिए किसी भी विस्तार से पहले सरकार को इसका विस्तृत आर्थिक आकलन सार्वजनिक करना चाहिए। देश के करदाताओं पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ और उससे मिलने वाले लोकतांत्रिक लाभ की स्पष्ट तुलना होनी चाहिए।
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सबसे बड़ा प्रश्न संसद की गुणवत्ता का है। लोकतंत्र केवल संख्या का खेल नहीं है। एक सक्षम संसद के लिए जरूरी है कि सांसदों को पर्याप्त समय मिले, वे विधेयकों पर गंभीरता से चर्चा करें, समितियां प्रभावी ढंग से काम करें और सरकार विपक्ष के सवालों का जवाब दे। इसी तरह विपक्ष का भी दायित्व है कि वह विरोध को सदन की कार्यवाही बाधित करने का माध्यम न बनाए।
संसद में हंगामा और व्यवधान किसी एक दल की समस्या नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सदन में असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन असहमति को बहस और तर्क के माध्यम से व्यक्त किया जाना चाहिए। यदि संसद लगातार स्थगन और शोर-शराबे का मंच बनती रही तो जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होगा।
इसलिए जरूरत केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि संसद की कार्यक्षमता बढ़ाने की है। सांसदों को बेहतर संसदीय प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीकी संसाधन, क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत जनसंपर्क व्यवस्था और संसदीय समितियों को अधिक प्रभावी अधिकार दिए जाने चाहिए। सदन में प्रत्येक सांसद को अपनी बात रखने का न्यायसंगत अवसर मिलना चाहिए और अनावश्यक व्यवधान पर प्रभावी कार्रवाई भी होनी चाहिए।
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लोकतंत्र की शक्ति भीड़ में नहीं, सार्थक संवाद में होती है। संसद में संख्या बल से अधिक महत्वपूर्ण सकारात्मक राष्ट्रीय इच्छा और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता है। इसलिए परिसीमन और सदस्य संख्या बढ़ाने जैसे बड़े फैसलों पर जल्दबाजी के बजाय व्यापक राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए।
संसद की गरिमा तभी बचेगी, जब वहां शोर से ज्यादा संवाद, टकराव से ज्यादा तर्क और राजनीतिक स्वार्थ से ऊपर राष्ट्रहित दिखाई देगा।





