पत्रकार सत्ता ब्यूरो
उज्जैन। मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्कूल को शहर से दूर स्थानांतरित किए जाने के विरोध में छात्राओं का आक्रोश आखिरकार आंसुओं में बदल गया। कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहीं छात्राएं अपनी परेशानी बताते-बताते रो पड़ीं। वीडियो में छात्राओं को भावुक होकर यह कहते सुना जा सकता है—“हमारी कोई नहीं सुन रहा… थोड़ी तो शर्म कर लो।”
छात्राओं का यह दर्द केवल स्कूल की इमारत बदलने का विरोध नहीं, बल्कि अपनी पढ़ाई, सुरक्षा और भविष्य को लेकर उनकी चिंता को सामने लाता है। छात्राओं का कहना है कि उनके स्कूल को शहर से करीब 12 से 15 किलोमीटर दूर दाऊदखेड़ी स्थानांतरित किया जा रहा है। इतनी दूर स्कूल जाने के लिए उन्हें रोजाना लंबा सफर तय करना पड़ेगा, जिससे पढ़ाई के साथ उनकी सुरक्षा और आने-जाने की मुश्किलें भी बढ़ेंगी।
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कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन के दौरान कई छात्राएं भावुक हो गईं। अपनी बात रखने की कोशिश में उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। रोती हुई छात्राओं की अपील ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान खींचा। उनका सवाल सीधा था—जब स्कूल तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाएगा तो वे पढ़ाई कैसे जारी रखेंगी?
छात्राओं के मुताबिक उन्होंने अपनी समस्या प्रशासन तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन जब उन्हें समाधान नजर नहीं आया तो उन्हें प्रदर्शन के लिए कलेक्टर कार्यालय पहुंचना पड़ा। वीडियो में छात्राओं का भावुक होना इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।
स्कूल दूर हुआ तो पढ़ाई भी दूर होने का डर
सरकारी स्कूलों को दूसरे स्थानों पर स्थानांतरित या विलय करने के फैसलों का उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था को बेहतर बनाना हो सकता है, लेकिन इसका असर विद्यार्थियों की पहुंच पर नहीं पड़ना चाहिए। खासकर छात्राओं के मामले में दूरी के साथ सुरक्षा, परिवहन और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे सवाल भी जुड़े होते हैं।
उज्जैन की छात्राओं का प्रदर्शन इसी चिंता को सामने ला रहा है। एक तरफ सरकार शिक्षा को मजबूत बनाने और बेटियों को आगे बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ यदि छात्राओं को पढ़ने के लिए 12-15 किलोमीटर दूर जाना पड़े तो उनके सामने व्यावहारिक कठिनाइयां खड़ी होना स्वाभाविक है।
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आंसुओं में छिपा बड़ा सवाल
कलेक्टर कार्यालय के बाहर रोती हुई छात्राओं का वीडियो अब इस पूरे मामले का सबसे मार्मिक पक्ष बन गया है। “हमारी कोई नहीं सुन रहा… थोड़ी तो शर्म कर लो” जैसे शब्द केवल नाराजगी नहीं, बल्कि व्यवस्था से मदद की गुहार हैं।
अब सवाल प्रशासन से है कि छात्राओं की इस पीड़ा को केवल एक प्रदर्शन मानकर नजरअंदाज किया जाएगा या स्कूल स्थानांतरण के फैसले पर दोबारा गंभीरता से विचार किया जाएगा। आखिर शिक्षा का उद्देश्य बच्चों तक स्कूल पहुंचाना है, न कि स्कूल को इतना दूर कर देना कि बच्चे वहां तक पहुंचने के लिए ही संघर्ष करने लगें।
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उज्जैन की इन छात्राओं के आंसू अब प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं—क्या उनकी पढ़ाई और सुरक्षा से जुड़ी चिंता का कोई समाधान निकलेगा?


