बयान के बाद बढ़ी सियासी हलचल, हाथी की सवारी की अटकलें तेज; भाजपा के सामने संगठन और सियासी समीकरण बचाए रखने की चुनौती
एस.वी.सिंह। पत्रकार सत्ता
गोरखपुर। पूर्वांचल की चर्चित चिल्लूपार विधानसभा सीट पर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित चंद परिवार की बहू अस्मिता चंद के हालिया बयान ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर नए राजनीतिक समीकरणों की संभावनाओं को जन्म दे दिया है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि वह भाजपा से दूरी बनाकर किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प की ओर कदम बढ़ा सकती हैं।
हालांकि अस्मिता चंद ने अभी भाजपा से इस्तीफा नहीं दिया है और न ही बसपा में शामिल होने की कोई औपचारिक घोषणा की है, लेकिन उनके बयान को लेकर चिल्लूपार की राजनीति में अटकलों का बाजार गर्म है। राजनीतिक जानकार इसे भाजपा के लिए संभावित झटके के तौर पर देख रहे हैं, खासकर इसलिए क्योंकि अस्मिता चंद की पहचान स्थानीय स्तर पर एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से जुड़ी हुई है।
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‘कमल’ से दूरी, ‘हाथी’ की ओर बढ़ने की चर्चा
अस्मिता चंद के रुख को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या वह आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के बजाय बहुजन समाज पार्टी का रुख करेंगी। यदि ऐसा होता है तो चिल्लूपार में मुकाबले का राजनीतिक गणित काफी बदल सकता है।
फिलहाल बसपा की ओर से भी उनकी उम्मीदवारी या पार्टी में शामिल होने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि वह निश्चित रूप से बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी। लेकिन उनके संकेतों ने इतना जरूर साफ कर दिया है कि चिल्लूपार में आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिल सकता है।
हरिशंकर तिवारी की पारंपरिक सीट रही है चिल्लूपार
चिल्लूपार विधानसभा सीट पूर्वांचल की राजनीति में लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। यह सीट पूर्व बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी की पारंपरिक राजनीतिक जमीन मानी जाती रही है। मौजूदा समय में यहां से भाजपा के राजेश त्रिपाठी विधायक हैं।
ऐसे में यदि अस्मिता चंद भाजपा से अलग होकर किसी मजबूत राजनीतिक विकल्प के साथ मैदान में उतरती हैं, तो इसका असर केवल उम्मीदवारों की अदला-बदली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्र के पुराने राजनीतिक समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं।
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भाजपा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है घटनाक्रम?
अस्मिता चंद भाजपा महिला मोर्चा में प्रदेश स्तर की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। ऐसे में यदि वह वास्तव में पार्टी से अलग होती हैं तो यह स्थानीय स्तर पर भाजपा के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा।
दूसरी ओर, यदि वह बसपा के साथ जाती हैं तो दलित, पिछड़े और परंपरागत राजनीतिक आधार के बीच नए समीकरण बनाने की कोशिश हो सकती है। इसका सीधा असर चिल्लूपार के आगामी चुनावी मुकाबले पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
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फिलहाल निगाहें अस्मिता चंद के अगले कदम पर टिकी हैं। भाजपा में बनी रहेंगी या नया राजनीतिक रास्ता चुनेंगी—इसका जवाब आने वाले दिनों में मिल सकता है। लेकिन उनके बयान ने चिल्लूपार की चुनावी बिसात पर नई चर्चाओं को जरूर जन्म दे दिया है।




