प्रतिसंपादकीय : मोदी के अंधभक्त बनाम राहुल के जेन जी, भारत का युवा किस तरफ जाएगा

अंधभक्ति बनाम जेन जी: भारत का युवा सवाल पूछेगा या नारे लगाएगा

एस.वी.सिंह
2014 के बाद भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव सत्ता का नहीं सोच का हुआ है। एक तरफ नेता के हर फैसले को सही मानने वाली अंधसमर्थन की राजनीति है, दूसरी तरफ सवाल पूछती जेन जी खड़ी हो रही है।

एक अंधसमर्थक से विकास पूछिए तो उसकी चर्चा धारा 370 से शुरू होती है, तीन तलाक और राम मंदिर से होती हुई राष्ट्रवाद तक पहुंचती है। रोजगार, शिक्षा, परीक्षा, महंगाई और अर्थव्यवस्था पर सवाल कीजिए तो बहस अक्सर नारे में बदल जाती है। आयेगा तो मोदी ही।

लेकिन नई पीढ़ी का सवाल अलग है।

जिस युवा को किताबों में डूबकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी थी, उसे पेपर लीक, परीक्षाओं में देरी, परिणाम और रोजगार की चिंता ने सड़कों पर ला दिया। अब वह पूछ रहा है। भर्ती कब होगी। परीक्षा का परिणाम कब आएगा। नौकरी कब मिलेगी।

एक छात्र का सवाल पूरे सिस्टम को आईना दिखाता है। चुनाव का परिणाम कुछ महीनों में आ जाता है, हमारा परीक्षा परिणाम 5वर्षों में भी क्यों नहीं आता।

दूसरा सवाल और भी बड़ा है। पहले परीक्षा के लिए आंदोलन, फिर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन और अब नौकरी के लिए आंदोलन। क्या हम सिर्फ आंदोलन ही करते रहें।

इन सवालों का जवाब नारे से नहीं दिया जा सकता। यही फर्क अंधसमर्थक और जागरूक नागरिक के बीच है। अंधसमर्थक पूछता है। मेरे नेता के खिलाफ कौन है। जागरूक युवा पूछता है। मेरे भविष्य के लिए कौन है। किसी नेता को पसंद करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अपनी बुद्धि और विवेक को किसी नेता के हवाले कर देना लोकतंत्र नहीं है। सरकार अच्छा करे तो समर्थन कीजिए, गलत करे तो सवाल कीजिए। यही लोकतंत्र की असली ताकत है।

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आज जेन जी के हाथ में वह हथियार है, जो पहले की पीढ़ियों के पास इतनी आसानी से नहीं था। सूचना। वह आंकड़े देख सकती है, नीतियां पढ़ सकती है, दावों की पड़ताल कर सकती है और सवाल पूछ सकती है।

इसलिए भारत की अगली राजनीतिक लड़ाई केवल मोदी बनाम राहुल नहीं होगी। असली लड़ाई होगी। नारा बनाम सवाल, दावा बनाम तथ्य और अंधसमर्थन बनाम राजनीतिक चेतना।

हमें तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं। किसी नेता का भक्त या देश का जागरूक नागरिक। राम मंदिर पर गर्व कीजिए, लेकिन रोजगार पर भी सवाल कीजिए। राष्ट्रवाद पर बात कीजिए, लेकिन शिक्षा और अर्थव्यवस्था के आंकड़े भी पढ़िए। नेता का समर्थन कीजिए, लेकिन उसके हर फैसले को सही मानना जरूरी नहीं। भारत को भक्तों की भीड़ नहीं, सवाल पूछने वाली पढ़ी लिखी पीढ़ी चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक नागरिक वह नहीं जो सरकार से असहमत है, बल्कि वह है जो सवाल पूछना ही छोड़ देता है। जेन जी अगर किताब से सवाल तक और सवाल से बदलाव तक पहुंचती है, तो यही भारत की अगली शांतिपूर्ण क्रांति की शुरुआत हो सकती है।

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