सामाजिक विडंबनाओं और राजनीतिक अव्यवस्था पर तीखी चोट, आम आदमी की भाषा में ग़ज़लों ने बनाई अलग पहचान
आलेख : इंद्रदेव त्रिवेदी
बरेली। हिंदी में ग़ज़ल लिखने की परंपरा अमीर खुसरो से मानी जाती है। प्राचीन और आधुनिक अनेक ग़ज़लकारों ने इस विधा को अपने-अपने तरीके से लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया। कई रचनाकारों ने ग़ज़ल की प्रचलित परंपरा से अलग नया तेवर अपनाया और इस विधा को नए आयाम दिए। इन्हीं के बीच ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार ने आम जनमानस को छूने वाली व्यावहारिक भाषा और तीखे तेवर के साथ ग़ज़ल को जनता की आवाज बना दिया।
दुष्यंत कुमार ने मानव मन के आंतरिक संबंधों, सामाजिक विडंबनाओं और तत्कालीन अव्यवस्था पर सलीके से करारी चोट की। उनकी रचनाओं में केवल विरोध नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव की आकांक्षा भी दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों ने साहित्य जगत के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी विशेष स्थान बनाया।
दुष्यंत कुमार की कृति ‘साये में धूप’ हिंदी ग़ज़ल के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। उनकी रचनाओं में जनता के शब्द, जनता के भाव, जनता की आवाज और जनता का पक्ष प्रमुखता से उभरता है। स्वयं दुष्यंत कुमार लिखते हैं—
“मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूं,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूं।
तू किसी रेल सी गुजरती है,
मैं किसी पुल सा थरथराता हूं।”
दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में जनमानस के विद्रोह, राजनीतिक व्यवस्था के प्रति छटपटाहट और बेहतर भविष्य की उम्मीद एक साथ दिखाई देती है। उनकी रचनाएं उस दौर की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी को स्वर देती हैं। उनकी चर्चित पंक्तियां हैं—
“कहां तो तय था चिरागां हरेक घर के लिए,
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहां दरख्तों के साए में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।”
हिंदी ग़ज़ल को मिला नया तेवर
सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सरजू प्रसाद मिश्र ने दुष्यंत कुमार के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा है कि यदि दुष्यंत कुमार अपनी प्रभावशाली ग़ज़लों के कारण हिंदी कविता पर छा न गए होते तो नए कवियों का ध्यान ग़ज़ल की ओर इतनी तेजी से आकर्षित नहीं होता। उनके अनुसार दुष्यंत ने उर्दू ग़ज़ल के मुहावरे के करीब जाकर उसमें आज की कविता के लिए जरूरी विषय-वस्तु को शामिल किया।
डॉ. मिश्र के मतानुसार हिंदी ग़ज़ल की परंपरा भले ही अमीर खुसरो और कबीर तक जाती हो, लेकिन उसकी आधुनिक और प्रभावशाली चाल दुष्यंत कुमार से शुरू होती है। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल की चुनौती स्वीकार की और अपना रचनात्मक व्यक्तित्व इस विधा को समर्पित किया।
दुष्यंत कुमार की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सामाजिक आंदोलनों से लेकर सार्वजनिक कार्यक्रमों तक उनकी ग़ज़लों की पंक्तियां लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का माध्यम बन गईं। उनकी यह रचना आज भी संघर्ष और उम्मीद दोनों का प्रतीक लगती है—
“इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है।
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ़ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।”
इसी तरह व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा को व्यक्त करती उनकी पंक्तियां हैं—
“हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।”
आम आदमी की आवाज बनीं ग़ज़लें
दुष्यंत कुमार के साहित्य पर विशेष कार्य और शोध करने वाले डॉ. सरदार मुज़ाहिर ने भी हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार के योगदान को महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार शमशेर बहादुर सिंह के बाद हिंदी ग़ज़ल में सामाजिक यथार्थ का एक नया दौर शुरू हुआ और दुष्यंत कुमार ने इस दौर को व्यापक पहचान दी।
दुष्यंत की ग़ज़लें बदलते सामाजिक परिवेश और आम आदमी की समस्याओं से जुड़ गईं। यही वजह है कि उनकी रचनाएं अपने समय की सच्चाइयों का दस्तावेज बनकर सामने आती हैं। ‘साये में धूप’ के माध्यम से दुष्यंत कुमार ने हिंदी ग़ज़ल को ऐसी पहचान दी, जिसने आगे आने वाले रचनाकारों को भी प्रभावित किया।
उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कठिन सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को आम आदमी की भाषा में अभिव्यक्त किया। उनकी ग़ज़लें मंच से लेकर आंदोलनों तक लोगों की जुबान पर चढ़ गईं।
93वीं जयंती पर स्मरण
जन-जन के मन को स्पर्श करने वाले लोकप्रिय ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की 93वीं जयंती पर उन्हें भावपूर्ण स्मरण करते हुए यही कामना है कि उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेकर हिंदी ग़ज़ल अपनी प्रतिष्ठा और व्यापकता को और मजबूत करे।
उनकी इन पंक्तियों के साथ दुष्यंत कुमार को पुनः स्मरण किया जा सकता है—
“ये जुबां हमसे सी नहीं जाती,
जिंदगी है कि जी नहीं जाती।
देखिए उस तरफ उजाला है,
जग तरफ रोशनी नहीं जाती।”
दुष्यंत कुमार की लेखनी आज भी यह याद दिलाती है कि साहित्य केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की सच्चाइयों को सामने रखने और बदलाव की चेतना जगाने का माध्यम भी है।





