2027 से पहले दलित सियासत में नई जंग, आकाश आनंद और चंद्रशेखर आजाद के बीच भी बढ़ी राजनीतिक चुनौती
शबीह हैदर। पत्रकार सत्ता
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से सत्ता के समीकरण तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण ताकतों में शामिल रहे हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि दलित राजनीति का केंद्र किसके पास रहेगा—मायावती की बहुजन समाज पार्टी या चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम)?
यह सवाल केवल दो दलों के बीच मुकाबले का नहीं है। इसके केंद्र में मायावती की राजनीतिक विरासत, आकाश आनंद का नया नेतृत्व और चंद्रशेखर आजाद का उभरता आंदोलनकारी चेहरा भी है।
2007 में बसपा ने बनाया था इतिहास
2007 का विधानसभा चुनाव बसपा की ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। मायावती के नेतृत्व में पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। दलित, विशेषकर जाटव मतदाता, बसपा के मजबूत आधार रहे। इसके बाद कई चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में लगातार गिरावट देखने को मिली।
2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी और उसका वोट प्रतिशत करीब 13 प्रतिशत रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी सीट नहीं जीत सकी। ऐसे में बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक दलित आधार को बनाए रखने और युवा मतदाताओं को फिर से जोड़ने की है।
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आकाश आनंद की वापसी से बसपा की नई रणनीति
बसपा ने 2027 को देखते हुए युवा चेहरे के रूप में आकाश आनंद को आगे किया है। जुलाई 2026 में उनके हाथरस से पार्टी के चुनावी अभियान की शुरुआत करने की घोषणा हुई और पार्टी ने राज्यभर में संगठन को सक्रिय करने की योजना बनाई। अभियान में युवाओं को विशेष रूप से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।
आकाश आनंद के सामने चुनौती दोहरी है। उन्हें एक तरफ मायावती की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना है, वहीं दूसरी तरफ उस युवा वर्ग में अपनी स्वीकार्यता बनानी है जो पारंपरिक दलगत राजनीति से अलग नए चेहरों और आंदोलनों की ओर आकर्षित हो रहा है।
नगीना की जीत ने चंद्रशेखर को दिया बड़ा आधार
दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद ने सड़क के आंदोलन से चुनावी राजनीति तक अपना रास्ता बनाया। भीम आर्मी के जरिए शिक्षा, सामाजिक न्याय और दलित अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहने के बाद उन्होंने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) बनाई।
2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नगीना सुरक्षित सीट से शानदार जीत दर्ज की। निर्वाचन परिणामों के अनुसार चंद्रशेखर आजाद को 5,12,552 वोट मिले और उन्होंने भाजपा के ओम कुमार को 1,51,473 वोटों से हराया। नगीना में उन्हें 51.19 प्रतिशत वोट मिले।
यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इससे चंद्रशेखर को केवल आंदोलनकारी नेता नहीं, बल्कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में राजनीतिक वैधता मिली।
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2026 में चंद्रशेखर ने बढ़ाई चुनावी सक्रियता
2027 के चुनाव से करीब एक साल पहले चंद्रशेखर आजाद ने संगठन विस्तार पर जोर बढ़ाया है। जून 2026 में उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के टिकट दावेदारों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत शुरू की। उनकी पार्टी संगठन को मजबूत करने और दलित आधार को विस्तार देने की कोशिश कर रही है।
चंद्रशेखर ने सत्ता परिवर्तन यात्रा का भी ऐलान किया। इसके जरिए संविधान, दलित-पिछड़ा-अल्पसंख्यक अधिकार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में लाने की कोशिश की जा रही है।
आकाश बनाम चंद्रशेखर: किसका रास्ता मजबूत?
- आकाश आनंद और चंद्रशेखर आजाद दोनों युवा दलित चेहरों के रूप में सामने हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा अलग है।
- आकाश आनंद के पास देश की प्रमुख दलित राजनीतिक पार्टी बसपा का संगठन, संसाधन और मायावती की विरासत है। उन्हें पार्टी के पारंपरिक ढांचे को मजबूत करने और नई पीढ़ी को जोड़ने की जिम्मेदारी मिली है।
- चंद्रशेखर आजाद के पास आंदोलन से निकले नेता की छवि और 2024 की नगीना जीत है। वह लगातार सार्वजनिक कार्यक्रमों, यात्राओं और राजनीतिक अभियानों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। 2026 में उनकी चुनावी तैयारी भी सक्रिय दिखाई दे रही है।
- यही अंतर दोनों नेताओं की राजनीतिक शैली को अलग करता है—एक तरफ पार्टी की स्थापित विरासत है तो दूसरी तरफ आंदोलन से निकला नया राजनीतिक चेहरा।
दलित वोट किसी एक पार्टी की जागीर नहीं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश का दलित मतदाता एक समान राजनीतिक समूह नहीं है। जाटव और गैर-जाटव दलितों के राजनीतिक रुझान अलग-अलग क्षेत्रों और चुनावों में बदलते रहे हैं। इसके अलावा भाजपा, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी दलित मतदाताओं के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। 2027 से पहले मुकाबला केवल बसपा और आजाद समाज पार्टी के बीच सीमित नहीं है। यही वजह है कि किसी एक दल को अभी से “दलित वोटों का असली हकदार” घोषित करना जल्दबाजी होगी।
कांशीराम की विरासत पर किसका दावा?
कांशीराम की विरासत का सवाल दोनों खेमों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। बसपा के पास कांशीराम द्वारा खड़ी की गई पार्टी और उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक संरचना है। वहीं चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के नाम में ही “कांशीराम” जुड़ा हुआ है और वह स्वयं बहुजन राजनीति तथा संविधान की रक्षा को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख हिस्सा बनाते हैं। इसलिए 2027 का चुनाव यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि दलित राजनीति में नई पीढ़ी का आकर्षण किस दिशा में जाता है।
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असली फैसला दलित मतदाता करेंगे
फिलहाल तस्वीर साफ है कि बसपा कमजोर हुई है, लेकिन खत्म नहीं हुई। उसके पास अभी भी मजबूत संगठनात्मक पहचान और पारंपरिक समर्थन का आधार है। दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी अभी राज्यव्यापी चुनावी ताकत नहीं बनी है, लेकिन चंद्रशेखर आजाद ने नगीना की जीत और 2026 की सक्रियता के जरिए अपनीराजनीतिक क्षमता जरूर साबित की है।
आकाश आनंद के सामने बसपा के पुराने जनाधार को वापस लाने की चुनौती है, जबकि चंद्रशेखर आजाद के सामने नगीना से आगे निकलकर पूरे उत्तर प्रदेश में संगठन खड़ा करने की चुनौती है।
इसलिए सवाल यह नहीं कि दलित वोटों का मालिक कौन है। असली सवाल यह है कि 2027 में कौन दलित मतदाता के भरोसे को वोट में बदल पाएगा। बसपा अपनी विरासत बचाती है या चंद्रशेखर नई राजनीतिक जमीन तैयार करते हैं—इसका अंतिम फैसला चुनावी मैदान में मतदाता ही करेंगे।




