216वीं पुण्यतिथि पर निशाने मीर पर हुई गुलपोशी, मेहमानों ने पेश किए मीर के कलाम
पत्रकार सत्ता ब्यूरो
लखनऊ। उर्दू अदब के महान शायर मीर तकी मीर की 216वीं पुण्यतिथि पर लखनऊ में उन्हें श्रद्धा और अदबी अंदाज में याद किया गया। रॉयल फैमिली ऑफ अवध की ओर से सिटी स्टेशन स्थित निशाने मीर पर आयोजित कार्यक्रम में नवाबी वंशजों और अतिथियों ने मीर तकी मीर की मजार पर गुलपोशी कर श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का संचालन रॉयल फैमिली ऑफ अवध के महासचिव शिकोह आजाद ने किया।
इस मौके पर शिकोह आजाद ने कहा कि मीर तकी मीर उर्दू शायरी में ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ के नाम से याद किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि मीर की शायरी में इश्क, दर्द, जुदाई, इंसानी जज़्बात और जिंदगी की नाजुक कैफियतों का ऐसा प्रभावशाली बयान मिलता है, जो सदियों बाद भी पाठकों और शायरी के शौकीनों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के न्यायाधीश सैयद कमर हसन रिजवी ने मीर का प्रसिद्ध शेर “पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है” पेश किया। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सेवानिवृत्त आईएएस अनीस अंसारी ने मीर का कलाम पेश किया। कार्यक्रम के दौरान मीर की शायरी और उनकी अदबी विरासत पर चर्चा हुई।
शिकोह आजाद ने कहा कि मीर तकी मीर का जन्म 1723 में आगरा, जिसे उस दौर में अकबराबाद कहा जाता था, में हुआ था। उनके पिता मीर मुत्तकी सूफी मिजाज और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। बचपन में पिता के निधन के बाद मीर को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके जीवन के शुरुआती अनुभवों का असर बाद में उनकी शायरी की भावनात्मक गहराई में दिखाई दिया। मीर के जन्म वर्ष 1723 और आगरा में जन्म का उल्लेख साहित्यिक स्रोतों में मिलता है।
मीर ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय दिल्ली में बिताया। मुगल सत्ता के कमजोर पड़ने और दिल्ली में हुए राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल का प्रभाव उनके लेखन पर भी पड़ा। बाद में वह लखनऊ आए और नवाब आसिफुद्दौला के दरबार से जुड़े। लखनऊ में उनके जीवन का अंतिम दौर बीता और यहीं उनका निधन हुआ।
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मीर तकी मीर को उर्दू गजल की दिल्ली शैली के प्रमुख शायरों में गिना जाता है। उनकी रचनाओं में मानवीय भावनाओं, प्रेम, विरह और जीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रमुख रूप से दिखाई देती है। रेख्ता भी उन्हें ‘ख़ुदा-ए-सुख़न’ के रूप में दर्ज करता है और उनका निधन 20 सितंबर 1810 को लखनऊ में होना बताता है।
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कार्यक्रम के माध्यम से वक्ताओं ने मीर तकी मीर की साहित्यिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और लखनऊ से जुड़े उनके अदबी योगदान को याद रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। शिकोह आजाद ने अगले वर्ष भी इसी स्थान पर मीर की याद में कार्यक्रम आयोजित करने की अपील की।
ब्यूरो रिपोर्ट, लखनऊ




