अखिलेश-राहुल-भाजपा तीनों बैकफुट पर, आधा-अधूरा मंडल अब पूरा लागू करने की चुनौती
पत्रकार सत्ता ब्यूरो
लखनऊ। 7 अगस्त को मान्यवर कांशीराम इको गार्डन में मंडल चेतना दिवस का मंच सजाते हुए आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चन्द्रशेखर आज़ाद ने सिर्फ एक मांग नहीं उठाई—उन्होंने उत्तर प्रदेश की सत्ता-समीकरणों की नींव ही हिला दी। मंडल कमीशन की 36 साल पुरानी रिपोर्ट को “आधा-अधूरा” करार देते हुए उन्होंने साफ कहा कि पिछड़ों को सिर्फ आरक्षण का टुकड़ा नहीं, बल्कि जनसंख्या के अनुपात में सत्ता, संसाधन, उद्योग, ठेके, न्यायपालिका और नौकरशाही में पूरी हिस्सेदारी चाहिए। और यह मांग उन्होंने उस दिन उठाई जब वीपी सिंह ने 1990 में मंडल लागू किया था।
पिछड़े ही तय करते हैं लखनऊ की कुर्सी
उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा सच यह है कि करीब 60 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग ही सत्ता का असली दावेदार तय करता है। चौधरी चरण सिंह ने किसानों-पशुपालकों को राजनीति में लाकर दो बार मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। वीपी सिंह ने मंडल के बल पर दिल्ली पहुंचा। कांशीराम ने उसी फॉर्मूले को जमीनी स्तर पर लागू कर मायावती को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। भाजपा ने भी पिछड़ों को फौरी जगह देकर सत्ता हासिल की। अब जब पेपर लीक, ई-20 पेट्रोल, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और पुलिस राज जैसे मुद्दे भाजपा के खिलाफ हवा बना रहे हैं, तब राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने भी पिछड़ों की तरफ रुख किया। लेकिन दोनों जल्दी ही दिशा बदल गए।
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राहुल का SC फोकस, अखिलेश का “पंडित” PDA
राहुल गांधी ने अचानक पिछड़ों को छोड़कर अनुसूचित जाति की लीडरशिप को केंद्र और प्रदेश में कमान सौंप दी। संदेश साफ था—कांग्रेस का असली फोकस पिछड़ों पर नहीं है। नतीजा: उबरने की कोशिश कर रही कांग्रेस से पिछड़े वर्ग में निराशा। उधर अखिलेश यादव ने PDA का नारा बुलंद किया, लेकिन फिर “पी” और “डी” को पंडित करार दे दिया। संदेश चला गया—PDA यानी पंडित अखिलेश। पिछड़ों के लिए यह साफ इशारा था कि उनका मुद्दा फिर से हाशिए पर है।
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चन्द्रशेखर ने ठीक उसी जगह कदम रखा जहां कांशीराम ने छोड़ा था। उन्होंने पिछड़ों की उपेक्षा को हथियार बनाया और मंडल की अधूरी रिपोर्ट का “पोस्टमार्टम” किया। मांग साफ थी:
- जिला पंचायत-नगर निगम से आगे बढ़कर विधानसभा और लोकसभा में राजनीतिक आरक्षण।
- उद्योग, सरकारी ठेके, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी।
- मंडल कमीशन की पूरी रिपोर्ट लागू हो।
मंच पर सत्यपाल चौधरी, पूर्व मंत्री मसूद अहमद, पूर्व आईएएस आरके वर्मा, कुंवर देवेंद्र गुर्जर, संजीव पाल, दामोदर यादव, विवेक सेन, अजीत पटेल समेत कुशवाहा, प्रजापति, सैनी, लोधी, कश्यप, अंसारी समेत तमाम पिछड़े चेहरों को जगह देकर उन्होंने भरोसा भी जीता।
सियासी समीकरण बदलने वाला दांव
अब सवाल यह है कि जिन पिछड़ों के वोट पर हर दल सत्ता में पहुंचा, उन्होंने पिछले 36 साल में इतनी सिद्दत से आवाज क्यों नहीं उठाई? चन्द्रशेखर के इस कदम ने अखिलेश और राहुल के हाथ से पिछड़ों का मुद्दा एक झटके में छीन लिया है। भाजपा भी अब सिर्फ “फौरी जगह” देकर काम नहीं चला सकती। उप्र की सियासत में एक नया दावेदार उभर रहा है—जो सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि हिस्सेदारी की राजनीति कर रहा है।
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मंडल चेतना दिवस सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था। यह उस राजनीतिक भूकंप का संकेत था जो 60 प्रतिशत आबादी की हक-हकूक की मांग से शुरू हुआ है। अब देखना यह है कि सपा, कांग्रेस और भाजपा इस चुनौती का जवाब कैसे देते हैं।




