धरना नहीं, ज्वाला: बारिश में भीगे ‘आजाद’ बने युवाओं की आवाज़

चंद्रशेखर से मिले ओवैसी

संसद परिसर में अकेले अम्बेडकर के चरणों में रातभर भीगते चंद्र शेखर आजाद ने पेपर लीक और लाठीचार्ज पर मोदी सरकार को कड़ी चनौती दी है। उनके इस अचानक उठाए गए कदम से मोदी सरकार सकते में है।

एस. वी. सिंह / पत्रकार सत्ता
लखनऊ /नई दिल्ली। लोकसभा के मानसून सत्र के बीच संसद भवन परिसर में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे रातभर बारिश में भीगते हुए नगीना के सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्र शेखर आजाद ने जो धरना दिया, वह महज एक प्रदर्शन नहीं बल्कि युवा आक्रोश की ज्वाला बन गया। पेपर लीक की लगातार हो रही घटनाओं और जंतर मंतर पर CJP (Cockroach Janata Party) प्रदर्शनकारियों पर पुलिस लाठीचार्ज के खिलाफ उनकी यह एकल लड़ाई विपक्षी दलों की सामूहिक चुप्पी के बीच सबसे मुखर आवाज साबित हो रही है। संसद भवन परिसर में धरने पर अकेले बैठे चंद्रशेखर आजाद विपक्ष की भीड़ से एकदम अलग नजर आ रहे हैं। उनके इस कदम की देशभर में तारीफ हो रही है।

पेपर लीक और लाठीचार्ज: आजाद की मांगें
चंद्र शेखर आजाद की मुख्य मांगें केंद्रित हैं — NEET समेत विभिन्न परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि “सरकार युवाओं की आवाज दबाने के बजाय सुननी चाहिए।” उन्होंने इस पूरे मुद्दे पर लोकसभा स्पीकर से चर्चा कराने की मांग भी की।

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घटनाक्रम की विस्तृत टाइमलाइन
19-20 जुलाई: CJP आंदोलन जंतर मंतर पर चल रहा था। सोनम वांगचुक जैसे नेताओं की भूख हड़ताल के बीच संसद मार्च की कोशिश हुई। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। चंद्र शेखर आजाद जंतर मंतर पहुंचे, छात्रों के साथ खड़े हुए और पुलिस से बहस की।

20 जुलाई शाम/रात: संसद परिसर में अंबेडकर प्रतिमा के नीचे धरना शुरू। रातभर बारिश में भीगते रहे, अकेले बैठे। मीडिया को दिए बयानों में अन्याय सहन न करने की ठान ली।

21 जुलाई सुबह-दोपहर: धरना जारी। NDTV, The Print समेत मीडिया से बातचीत। स्पीकर से मुलाकात का जिक्र। विपक्षी दलों से समर्थन की अपील।
यह धरना अब पूरे देश का ध्यान खींच चुका है।

समर्थन देने वाले सांसद

धरना स्थल पर पहुंचकर प्रत्यक्ष समर्थन:

  • हनुमान बेनीवाल (आरएलपी, राजस्थान)
  • राजकुमार रोत (बांसवाड़ा सांसद)
  • असदुद्दीन ओवैसी, (एआईएमआईएम)

विपक्षी दलों का व्यापक समर्थन: राहुल गांधी ने स्पीकर से चर्चा की। जंतर मंतर पर टीएमसी की महुआ मोइत्रा आम आदमी पार्टी के संजय सिंह समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव और कांग्रेस के नेता पवन खेड़ा ने जंतर मंतर पहुंच कर युवाओं के इस आंदोलन का समर्थन किया था। लेकिन इन सब से 10 कदम आगे निकलते हुए चंद्रशेखर आजाद ने संसद में अकेले युवाओं की आवाज बनने की ठान ली। जंतर मंतर पर भी वह कई बार गए और युवाओं का हौसला बढ़ाया। सोनम वांगचुक को जब रन जंतर मंतर से हटकर अस्पताल मेंशफ्ट करने के बाद रात में पुलिस जंतर मंतर से युवाओं को खदेड़ने की योजना बना रही थी, उसी वक्त जंतर मंतर पहुंचकर आजाद ने पुलिस के मंसूबों पर पानी फेर दिया।

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बारिश में भीगता ‘संस्कार’: अन्य नेताओं से अलग छवि
जब ज्यादातर विपक्षी नेता सदन में हंगामा या बयानबाजी तक सीमित रहते हैं, तब चंद्र शेखर आजाद ने रातभर बारिश में भीगकर अनोखा ‘संस्कार’ दिखाया। यह छवि — संविधान और अम्बेडकर की प्रतिमा के नीचे अकेले युवाओं के लिए लड़ा जा रहा सांसद — सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। अन्य दलों के नेता अक्सर सामूहिक फोटो सेशन या प्रेस कॉन्फ्रेंस तक रह जाते हैं, लेकिन आजाद की यह ‘अकेले खड़ा होना’ बहुजन और युवा राजनीति का नया प्रतीक बन गया। इससे उन्होंने न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश-दुनिया का ध्यान खींचा। अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर उनकी तस्वीरें ‘Indian MP’s lone vigil in rain’ के रूप में चर्चित हुईं।

राजनीतिक विश्लेषण: सबसे मजबूत आवाज
इस पूरे घटनाक्रम में चंद्र शेखर आजाद की छवि एक मजबूत, अडिग और युवा-केंद्रित नेता के रूप में उभरी है। NDA सरकार पर पेपर लीक और दमन की राजनीति का आरोप लगाते हुए उन्होंने विपक्ष की ‘सामूहिक चुप्पी’ को भी चुनौती दी। यह धरना 2024 लोकसभा चुनाव के बाद आजाद की राष्ट्रीय छवि को और मजबूत कर रहा है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 2027 के चुनावी समीकरणों में।

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विश्लेषकों का मानना है कि आजाद ने ‘दलित-बहुजन-युवा’ गठजोड़ को नया आयाम दिया। जबकि बड़े विपक्षी दल मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी बरत रहे थे, आजाद की एकल लड़ाई ने उन्हें ‘सबसे मुखर आवाज’ बना दिया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि संसद के अंदर हंगामा और बाहर धरना — दोनों मोर्चों पर आजाद सक्रिय हैं।

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बारिश में भीगता यह सांसद न सिर्फ छात्रों का दर्द साझा कर रहा है बल्कि लोकतंत्र में ‘सुनने’ की संस्कृति की मांग कर रहा है। अगर सरकार ने इस आवाज को अनसुना किया तो युवा आक्रोश और बढ़ सकता है। चंद्र शेखर आजाद की यह जद्दोजहद साबित कर रही है कि सच्ची राजनीति सदन की कुर्सी से ज्यादा सड़क और सिद्धांत पर टिकी होती है।

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