✍️ सनी विश्राम सिंह
संपादक, पत्रकार सत्ता
भारत को युवा देश कहा जाता है। करोड़ों युवा अपने सपनों को साकार करने के लिए वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। कोई सरकारी नौकरी की तैयारी करता है, कोई मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के लिए दिन-रात एक कर देता है। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगें, परीक्षा रद्द हो जाए और लाखों अभ्यर्थियों को फिर से उसी तनाव से गुजरना पड़े, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर इस व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है?
पिछले एक दशक में देश ने पेपर लीक की अनेक घटनाएं देखी हैं। उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET), राजस्थान REET, उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती, NEET-UG, UGC-NET जैसी कई परीक्षाएं विवादों में रहीं। कहीं परीक्षा रद्द हुई, कहीं जांच बैठी, कहीं गिरफ्तारियां हुईं और कहीं वर्षों तक मुकदमे चलते रहे। हर बार नुकसान केवल एक व्यक्ति का नहीं हुआ, बल्कि लाखों युवाओं के समय, धन और मानसिक संतुलन पर गहरी चोट पहुंची।
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सबसे दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि इस विषय पर सरकार और मीडिया की तस्वीर अलग-अलग दिखाई देती है।
संसद में सरकार ने कई अवसरों पर कहा कि UPSC, SSC, RRB और IBPS जैसी प्रमुख भर्ती परीक्षाओं में हाल के वर्षों में पेपर लीक की कोई घटना दर्ज नहीं हुई। दूसरी ओर, अनेक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने 2014 के बाद देशभर में दर्जनों पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं का दस्तावेजी विवरण प्रकाशित किया है।

कुछ रिपोर्टों में 50 से अधिक, तो कुछ में 80 से अधिक मामलों का उल्लेख मिलता है। यह अंतर अपने आप में गंभीर प्रश्न खड़ा करता है—क्या सरकार केवल कुछ केंद्रीय एजेंसियों की परीक्षाओं की बात कर रही है, जबकि राज्यों में हुई घटनाएं अलग गिनी जा रही हैं? यदि ऐसा है, तो देश को एक समेकित और पारदर्शी तस्वीर क्यों नहीं दिखाई जाती?
यहां असली मुद्दा आंकड़ों की बहस नहीं है। असली मुद्दा वह छात्र है, जिसने दो-दो साल की तैयारी के बाद परीक्षा रद्द होने की खबर सुनी। वह परिवार है जिसने कोचिंग, किराया और किताबों पर अपनी बचत खर्च कर दी। वह अभ्यर्थी है जिसकी आयु सीमा इसी इंतजार में समाप्त हो गई।
सरकार ने वर्ष 2024 में Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act लागू किया। इसमें पेपर लीक को संगठित अपराध मानते हुए कठोर सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन कानून बन जाना ही पर्याप्त नहीं होता। सवाल यह है कि क्या इसके बाद पेपर लीक की घटनाएं पूरी तरह रुक गईं? क्या दोषियों को समयबद्ध सजा मिली? क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई जिनकी निगरानी में ऐसी घटनाएं हुईं?

जवाबदेही केवल अपराधियों की नहीं, व्यवस्था की भी होनी चाहिए। जब किसी परीक्षा में पेपर लीक होता है तो केवल नकल माफिया ही दोषी नहीं होते। कहीं न कहीं प्रशासनिक विफलता, सुरक्षा तंत्र की कमजोरी या संस्थागत लापरवाही भी होती है। यदि हर बार केवल छोटे दलाल गिरफ्तार होंगे और व्यवस्था बचती रहेगी, तो समस्या का समाधान कभी नहीं होगा।
मीडिया की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मीडिया का दायित्व केवल सनसनी फैलाना नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करना और जनता के सामने सत्य रखना है। यदि मीडिया की रिपोर्टें सरकार के दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही हैं, तो लोकतंत्र में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह स्पष्ट और पारदर्शी उत्तर दे। आंकड़ों को लेकर भ्रम लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
आज आवश्यकता किसी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय परीक्षा सुरक्षा नीति की है। देश में आयोजित सभी सार्वजनिक परीक्षाओं का एक केंद्रीय डेटाबेस बने, हर पेपर लीक की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी हो, जांच समयबद्ध हो, दोषियों को शीघ्र दंड मिले और प्रभावित छात्रों को उचित राहत एवं आयु सीमा में छूट जैसी सुविधाएं दी जाएं।
युवाओं का विश्वास किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी होता है। यदि वही विश्वास टूटने लगे, तो केवल परीक्षाएं नहीं, पूरे तंत्र की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।

अब समय आ गया है कि सरकार, परीक्षा एजेंसियां और पूरा प्रशासनिक तंत्र यह सुनिश्चित करे कि देश का कोई भी छात्र अपनी मेहनत का परिणाम किसी पेपर माफिया के हाथों बर्बाद होते न देखे।
क्योंकि पेपर लीक केवल एक अपराध नहीं, बल्कि लाखों सपनों की हत्या है।
लेखक परिचय
सनी विश्राम सिंह
संपादक, पत्रकार सत्ता
वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक। राजनीति, शिक्षा, प्रशासन और जनसरोकार के मुद्दों पर तथ्यपरक एवं निष्पक्ष लेखन के लिए जाने जाते हैं।




