मोहन भागवत के ‘मुसलमान भारत का हिस्सा हैं’ वाले बयान पर मदनी की प्रतिक्रिया, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा पर उठाए सवाल
पत्रकार सत्ता ब्यूरो
नई दिल्ली । जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका में दिए उस बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसमें भागवत ने कहा था कि अगर कोई हिंदू यह समझता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए तो वह हिंदू नहीं है।
मौलाना मदनी ने सवाल किया कि यदि मोहन भागवत वास्तव में इस विचार को आरएसएस की नीति का हिस्सा मानते हैं तो देश में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत, हिंसा, बहिष्कार और देश से बाहर निकालने की धमकियां देने वालों के खिलाफ संगठन ने अब तक क्या कार्रवाई की है?
इसे भी देखें- कनाडा में बैठे भोलू शाहपुरिया ने रची थी अंकित बालियान की हत्या की साजिश : DGP
उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर नफरत फैलाने, मॉब लिंचिंग करने, भड़काऊ बयान देने और मुसलमानों के आर्थिक एवं सामाजिक बहिष्कार की अपील करने वाले लोगों के खिलाफ स्पष्ट कार्रवाई की जरूरत है। मदनी ने कहा कि केवल बयान देने से स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि जमीन पर भी स्पष्ट रुख दिखाई देना चाहिए।
‘भाजपा-आरएसएस का संबंध किसी से छिपा नहीं’
मौलाना मदनी ने कहा कि भाजपा और आरएसएस के बीच वैचारिक और संगठनात्मक संबंध सार्वजनिक रूप से जाने जाते हैं। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल समेत हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े संगठनों का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित नफरत भरे बयानों और बहिष्कार की अपीलों पर आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व खामोश क्यों रहता है।
उन्होंने दावा किया कि देश के विभिन्न हिस्सों में मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों, खानकाहों और विश्वविद्यालयों को लेकर विवाद तथा कार्रवाई के मामले सामने आते रहे हैं। मदनी ने कहा कि ऐसे मामलों पर भी आरएसएस प्रमुख की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया की अपेक्षा की जाती है।
यह भी जानें- साइबर ठगों से बचाव में सतर्कता और जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार
ईसाइयों की सुरक्षा का भी मुद्दा उठाया
जमीयत अध्यक्ष ने कहा कि मामला केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार ईसाई समुदाय के लोग भी देश के विभिन्न हिस्सों में नफरत, हिंसा और धार्मिक गतिविधियों में कथित हस्तक्षेप की शिकायतें करते रहे हैं। उन्होंने चर्चों और पादरियों को निशाना बनाए जाने तथा धर्मांतरण के नाम पर ईसाई समुदाय को संदेह के घेरे में रखने का आरोप लगाया।
‘बयान नहीं, अधिकारों की सुरक्षा जरूरी’
मौलाना मदनी ने कहा कि यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मुसलमान भारत का हिस्सा हैं। उनके अनुसार मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ सभी अल्पसंख्यकों के धार्मिक, शैक्षिक, नागरिक और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।
इसे भी देखें- एआई और आईपीओ पर सितंबर में सेमिनार कराएगा चैम्बर ऑफ कॉमर्स
उन्होंने कहा कि यदि किसी नागरिक को उसके धर्म के आधार पर भेदभाव, भय या सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है तो उसके खिलाफ स्पष्ट रुख होना चाहिए। नफरत फैलाने, हिंसा का समर्थन करने और अल्पसंख्यकों को देश से निकालने की धमकी देने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘भारत सभी धर्मों का साझा देश’
मदनी ने कहा कि भारत हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और सभी धर्मों को मानने वाले लोगों का साझा देश है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि देश की ताकत विविधता, आपसी सम्मान और भाईचारे में है, न कि नफरत और विभाजन में।
मौलाना अरशद मदनी की यह प्रतिक्रिया मोहन भागवत के हालिया बयान के बाद सामने आई है और इसके जरिए उन्होंने आरएसएस नेतृत्व से अपने कथन को व्यवहार में भी लागू करने की मांग की है।
ब्यूरो रिपोर्ट, पत्रकार सत्ता




