लेखक – निर्भय सक्सेना
बरेली। ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से बरेली का देश और प्रदेश में विशिष्ट स्थान रहा है। महाभारतकालीन पांचाल क्षेत्र से जुड़ी इस धरती का संबंध पांडव परिवार की पुत्रवधू द्रौपदी से भी माना जाता है। द्रौपदी को पांचाली के नाम से भी जाना जाता था। मान्यता है कि बरेली के आंवला क्षेत्र में पांचाल नरेश की पुत्री द्रौपदी का संबंध रहा। आज भी आंवला में लीलौर झील और किले के अवशेष इस प्राचीन इतिहास की याद दिलाते हैं।
राजनीतिक क्षेत्र में भी बरेली की पहचान बेहद प्रभावशाली रही है। स्वतंत्रता सेनानी और भारत रत्न से सम्मानित पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 1952 में बरेली शहर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था। कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पंत का मुकाबला भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी और जकाती मोहल्ला निवासी प्रसिद्ध अधिवक्ता मनमोहन लाल माथुर से हुआ। कड़े संघर्ष में विजय प्राप्त कर गोविंद बल्लभ पंत विधानसभा पहुंचे और बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
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गोविंद बल्लभ पंत का सार्वजनिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति तक अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वह संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री भी रहे और स्वतंत्र भारत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला। बाद में वर्ष 1955 से 1961 तक उन्होंने भारत सरकार के गृह मंत्री के रूप में भी सेवाएं दीं। उनका जन्म 10 सितंबर 1887 को खूंट गांव, जिला अल्मोड़ा, उत्तराखंड में हुआ था। उनके माता-पिता का नाम गोविंदी पंत और मनोरथ पंत था। 7 मार्च 1961 को दिल्ली में उनका निधन हुआ। आज उनकी 139वीं जयंती के अवसर पर बरेली से उनके राजनीतिक संबंधों की स्मृति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
बरेली शहर सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का दबदबा
गोविंद बल्लभ पंत के बाद भी बरेली शहर विधानसभा सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का प्रभाव कायम रहा। वर्ष 1967 तक हुए चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशियों का वर्चस्व रहा। वर्ष 1969 में भारतीय क्रांति दल (बीकेडी) के रामसिंह खन्ना ने इस सीट पर जीत दर्ज की। बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए और वर्ष 1980 में बरेली से जीतकर प्रदेश सरकार में नगर विकास मंत्री बने।
इसके बाद बरेली शहर सीट से भाजपा के डॉ. दिनेश जौहरी विजयी हुए और प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने। उनके बाद राजेश अग्रवाल ने इस सीट से जीत हासिल की और प्रदेश सरकार में वित्त मंत्री का दायित्व संभाला। बाद में बरेली कैंट विधानसभा सीट से जीतकर वह उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष भी बने। राजेश अग्रवाल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी रहे।
इसके बाद बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर तीन बार जीत दर्ज करने वाले डॉ. अरुण कुमार प्रदेश सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्री के रूप में दायित्व संभाल रहे हैं।
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संतोष गंगवार की बरेली से केंद्र तक लंबी राजनीतिक पारी
बरेली लोकसभा सीट ने भी राष्ट्रीय राजनीति को कई महत्वपूर्ण नेता दिए हैं। भाजपा के संतोष कुमार गंगवार ने बरेली लोकसभा सीट से आठ बार जीत दर्ज कर केंद्र सरकार में पेट्रोलियम, वस्त्र और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। वर्तमान में वह झारखंड के राज्यपाल का दायित्व निभा रहे हैं।
बरेली लोकसभा क्षेत्र का पहला चुनाव वर्ष 1952 में हुआ था। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के टिकट पर सतीश चंद्र अग्रवाल विजयी होकर संसद पहुंचे। वर्ष 1957, 1962 और 1971 के लोकसभा चुनावों में भी बरेली की जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि चुना। वह केंद्र सरकार में रक्षा राज्य मंत्री रहे।
वर्ष 1962 में भारतीय जनसंघ के टिकट पर ब्रजराज सिंह सांसद चुने गए। वर्ष 1977 में लोकदल के प्रत्याशी राममूर्ति ने जीत दर्ज की। आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस ने एक बार फिर बरेली में वापसी की। वर्ष 1980 और 1984 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी बेगम आबिदा अहमद विजयी होकर लोकसभा पहुंचीं।
इसके बाद बरेली लोकसभा सीट पर भाजपा का प्रभाव लगातार मजबूत होता गया। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन को बरेली की जनता ने अपना सांसद चुना। इसके बाद फिर संतोष कुमार गंगवार लगातार चुनाव जीतते रहे। उनके बाद भाजपा के छत्रपाल गंगवार वर्तमान में बरेली लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
गांधी परिवार के सदस्यों का भी बरेली से रहा संबंध
बरेली जिले की राजनीतिक अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि गांधी परिवार के सदस्यों का भी इस क्षेत्र से राजनीतिक संबंध रहा। मेनका गांधी ने पीलीभीत के बाद बरेली जिले की आंवला लोकसभा सीट का भाजपा के टिकट पर प्रतिनिधित्व किया। वहीं संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी ने बरेली जिले के बहेड़ी विधानसभा क्षेत्र के लोगों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया।
धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता की पहचान
बरेली को स्मार्ट सिटी के साथ-साथ नाथ नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यह जिला साम्प्रदायिक सद्भाव और धार्मिक विविधता का भी उदाहरण माना जाता है। सनातन धर्म के साथ इस्लाम के सुन्नी सम्प्रदाय का प्रमुख बरेलवी मसलक भी यहीं विकसित हुआ। आला हजरत की परंपरा से जुड़ी धार्मिक पहचान के अलावा शहर में खानकाह-ए-नियाजिया की दरगाह भी महत्वपूर्ण आस्था केंद्र है।
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बरेली में मुस्लिम व्यवसायी फजल उर रहमान उर्फ चुन्ना मियां द्वारा कारसेवा कर बनवाया गया चुन्ना मियां मंदिर भी धार्मिक सद्भाव का उल्लेखनीय उदाहरण है। वहीं आंवला क्षेत्र का संबंध जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ की कर्मस्थली के रूप में भी बताया जाता है।
प्रदेश की राजनीति को कई बड़े नेता दिए
ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के साथ बरेली ने प्रदेश और देश की राजनीति को भी कई महत्वपूर्ण नेता दिए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गोविंद बल्लभ पंत के रूप में उत्तर प्रदेश को शुरुआती दौर का नेतृत्व देने में बरेली की भूमिका उल्लेखनीय रही। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की राजनीतिक कर्मभूमि भी बरेली रही।
आज बरेली की राजनीति में भाजपा का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जिले में भाजपा के सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य हैं। इसके अलावा नगर निगम और जिला पंचायत स्तर पर भी पार्टी का प्रभाव है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में बरेली से जुड़े प्रमुख भाजपा नेताओं में सांसद छत्रपाल गंगवार, विधायक, एमएलसी बहोरन लाल मौर्य, कुंवर महाराज सिंह ठाकुर और सरदार हरि सिंह ढिल्लों, मेयर डॉ. उमेश गौतम, जिला पंचायत अध्यक्ष रश्मि पटेल तथा भाजपा ब्रज क्षेत्र अध्यक्ष पूरन लाल लोधी शामिल हैं।
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इस तरह पांचाल की प्राचीन स्मृतियों से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन और आधुनिक लोकतांत्रिक राजनीति तक बरेली की यात्रा बेहद महत्वपूर्ण रही है। द्रौपदी की पांचाली से लेकर गोविंद बल्लभ पंत और संतोष गंगवार जैसे राष्ट्रीय नेताओं तक, बरेली की राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान ने देश-प्रदेश के इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी है।
— निर्भय सक्सेना




