एक करोड़: जंतर मंतर छात्र आंदोलन से जुडी माँ की ममता पर मार्मिक लघुकथा

एक करोड़: माँ की ममता पर मार्मिक लघुकथा

कहानी — सविता श्रीवास्तव ‘आस्मां’

राघव… बेटा… कहाँ हो तुम…?

ममता की आँख खुली तो उसके हाथ अब भी हवा में अपने बेटे को टटोल रहे थे। सपना फिर वही था—राघव सफेद एप्रन पहने मुस्कुराते हुए कह रहा था, “माँ, मेरा चयन हो गया… अब मैं डॉक्टर बनूँगा।”

लेकिन अगले ही पल सपना टूट गया।

कमरे की दीवार पर टंगी राघव की मुस्कुराती तस्वीर उसे निहार रही थी। तस्वीर पर चढ़ी माला ने फिर याद दिला दिया कि उस मनहूस दिन को कई महीने बीत चुके हैं, जब नीट परीक्षा के पेपर लीक, टूटे सपनों और गहरे अवसाद ने उसके इकलौते बेटे को उससे हमेशा के लिए छीन लिया था।

समय आगे बढ़ गया था…

लेकिन ममता की दुनिया उसी दिन ठहर गई थी।

वह आज भी रोज़ राघव के कमरे में जाती, उसकी किताबों की धूल साफ करती, बिखरे नोट्स समेटती और डॉक्टर बनने के उसके सपनों को निहारते-निहारते खो जाती।

तभी मनोज ने उसे उसकी खोई हुई दुनिया से झकझोरते हुए कहा—

“ममता… कब तक इस दर्द में डूबी रहोगी? सुनो… आज सरकार की ओर से राघव के मुआवज़े के एक करोड़ रुपये मिल गए हैं। कहते हैं, हमारे बेटे को न्याय मिल गया…”

ममता ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी सूनी आँखें मनोज के हाथ में रखे कागज़ों पर टिक गईं।

उसके होंठ काँपे।

“एक करोड़…?”

कुछ क्षण तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा।

फिर उसने राघव की तस्वीर को सीने से लगा लिया और भर्राए स्वर में बोली—

“इन रुपयों का मैं क्या करूँ, मनोज…?

काश… कोई मेरे राघव को एक करोड़ साँसें लौटा देता…

बस… एक दिन… नहीं, एक पल ही सही…

वह फिर से ‘माँ’ कहकर पुकार लेता…

मेरे लिए वही दुनिया का सबसे बड़ा ख़ज़ाना होता…”

यह कहते हुए वह राघव के कमरे में चली गई। मेज़ पर अब भी खुली मेडिकल की किताबें थीं। एक कॉपी के पहले पन्ने पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

“मेरा सपना—डॉक्टर बनकर माँ-बाबूजी का नाम रोशन करना।”

मनोज वहीं खड़ा रह गया।

उसके हाथ में एक करोड़ रुपये के मुआवज़े की स्वीकृति थी…

और सामने एक ऐसी माँ थी, जिसके लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत सिर्फ अपने बेटे की एक साँस, एक “माँ” और उसका अधूरा सपना था।

संदेश

मुआवज़ा किसी जीवन की कीमत नहीं हो सकता। किसी भी व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता मृत्यु के बाद सहायता राशि घोषित करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होने से रोकना है, जिनमें किसी युवा के सपने और साँसें एक साथ दम तोड़ दें।

लेखिका परिचय:

savita shrivastava
सविता श्रीवास्तव ‘आस्मां’

सविता श्रीवास्तव ‘आस्मां’ सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन विषयों पर आधारित साहित्य का नियमित सृजन करती हैं। उनकी रचनाएँ समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करने के साथ मानवीय मूल्यों को सशक्त स्वर देती हैं।

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