धर्मनिरपेक्षता और संविधान का मूल ढांचा क्या भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जा सकता है

लेखक : शबीह हैदर
भारत में समय समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या देश को संवैधानिक रूप से हिंदू राष्ट्र घोषित किया जा सकता है। यह प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं बल्कि पूरी तरह संवैधानिक और न्यायिक व्याख्या से जुड़ा हुआ है। इस विषय पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संविधान के प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों को समझना आवश्यक है।

भारत का संविधान देश को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है। वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में “समाजवादी” और “धर्मनिरपेक्ष” शब्द जोड़े गए। हालांकि इससे पहले भी सर्वोच्च न्यायालय कई निर्णयों में स्पष्ट कर चुका था कि संविधान की मूल भावना सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार की है।

संविधान का मूल ढांचा क्या है

संविधान में कहीं भी “मूल ढांचा” शब्द का उल्लेख नहीं है। यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय ने विकसित किया। इसका अर्थ यह है कि संविधान की कुछ मूल विशेषताएं ऐसी हैं जिन्हें संसद संविधान संशोधन के माध्यम से भी समाप्त नहीं कर सकती।

इन मूल विशेषताओं में लोकतंत्र विधि का शासन न्यायपालिका की स्वतंत्रता संघीय व्यवस्था स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव तथा धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांत शामिल माने गए हैं।

केशवानंद भारती फैसला क्यों महत्वपूर्ण है

वर्ष 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला दिया। न्यायालय ने माना कि संसद के पास संविधान संशोधन की व्यापक शक्ति है लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। संसद संविधान के मूल ढांचे को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती।

यही निर्णय भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का आधार माना जाता है। इसके बाद से संसद द्वारा किए गए प्रत्येक बड़े संविधान संशोधन की समीक्षा इसी कसौटी पर होती रही है।

एस आर बोम्मई मामला क्या कहता है

वर्ष 1994 में एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है।

न्यायालय ने कहा कि राज्य का कोई अपना धर्म नहीं हो सकता। सरकार का दायित्व सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना है। यदि कोई राज्य सरकार संविधान के इस सिद्धांत के विपरीत कार्य करती है तो यह संवैधानिक समीक्षा के दायरे में आएगा।

क्या संसद बहुमत के आधार पर हिंदू राष्ट्र घोषित कर सकती है

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है। यदि संसद संविधान में ऐसा संशोधन पारित करती है जो संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करता है तो उस संशोधन की न्यायिक समीक्षा हो सकती है। यदि सर्वोच्च न्यायालय यह पाता है कि संशोधन संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है तो वह उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।

इसी कारण अधिकांश संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि यदि किसी संशोधन के माध्यम से भारत की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था को समाप्त करने का प्रयास किया जाए तो उसकी वैधता सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती के दायरे में आएगी।

हालांकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि “भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना कानूनी रूप से बिल्कुल असंभव है” जैसी बात को पूर्ण और अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं कहा जा सकता। ऐसा कोई प्रयास यदि कभी होता है तो उसका अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या पर निर्भर करेगा। न्यायालय भविष्य में किसी संभावित संशोधन पर क्या निर्णय देगा, इसका पूर्वानुमान निश्चित रूप से नहीं लगाया जा सकता।

शक्तियों का संतुलन

भारतीय संविधान ने संसद और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट संतुलन स्थापित किया है। संसद कानून बनाती है। कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है। न्यायपालिका संविधान की कसौटी पर उनकी वैधता की जांच करती है। इसी व्यवस्था को संवैधानिक संतुलन कहा जाता है।

राजनीतिक बहस और संवैधानिक मर्यादा

भारत में विभिन्न राजनीतिक दल समय समय पर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के अनुसार अलग अलग विचार रखते हैं। किसी दल का किसी विषय पर राजनीतिक मत होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। लेकिन किसी भी बड़े संवैधानिक परिवर्तन की अंतिम परीक्षा संविधान और सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या के अनुरूप ही होती है। इसलिए इस विषय पर सार्वजनिक बहस तथ्यों और कानून के आधार पर होनी चाहिए न कि भावनाओं या सामाजिक वैमनस्य के आधार पर।

निष्कर्ष

भारत का संविधान विविधता में एकता की अवधारणा पर आधारित है। सर्वोच्च न्यायालय के केशवानंद भारती (1973) और एस आर बोम्मई (1994) जैसे ऐतिहासिक निर्णयों ने संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत को मजबूत किया है, जिसमें धर्मनिरपेक्षता को एक महत्वपूर्ण तत्व माना गया है।

ऐसे में भारत के संवैधानिक स्वरूप से जुड़े किसी भी बड़े परिवर्तन का प्रश्न केवल राजनीतिक बहुमत का विषय नहीं है बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक परीक्षण का भी विषय है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु संविधान के दायरे में रहकर संवाद और शांतिपूर्ण बहस ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

 

*संपादकीय टिप्पणी: यह लेख संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर आधारित कानूनी विश्लेषण है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक विचारधारा का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि संवैधानिक स्थिति को तथ्यों के आधार पर समझाना है।

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