चीन-बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकियां: भारत को क्या सीख लेनी चाहिए?

बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान हाथ मिलाते हुए।

– सनी विश्राम सिंह, संपादक, पत्रकार सत्ता

बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया मुलाकात दक्षिण एशिया की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं और आर्थिक, व्यापारिक तथा आधारभूत संरचना सहयोग को नई दिशा देने की बात कही गई है। स्वाभाविक रूप से भारत में भी इस मुलाकात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

हालांकि भारत को इस घटनाक्रम को केवल चीन और बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकियों के चश्मे से देखने की बजाय व्यापक क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने की आवश्यकता है।

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दक्षिण एशिया के देशों के लिए आज आर्थिक विकास, निवेश और रोजगार सबसे बड़ी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में बांग्लादेश यदि चीन, भारत, अमेरिका, जापान या किसी अन्य देश से निवेश आकर्षित करने का प्रयास करता है तो इसे केवल भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उसकी विकास यात्रा का भी हिस्सा है।

  • चीन-बांग्लादेश की बढ़ती नजदीकी, भारत के लिए क्या हैं संकेत?
  • शी जिनपिंग और तारिक रहमान की मुलाकात पर भारत को क्या सोचना चाहिए?
  • चीन-बांग्लादेश संबंधों पर भारत की रणनीति कैसी हो?

भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल सरकारों या समझौतों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच साझा इतिहास, सांस्कृतिक निकटता, भाषा, व्यापार, सीमाई सहयोग और लोगों के बीच मजबूत संपर्क मौजूद हैं। यही कारण है कि किसी एक कूटनीतिक यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय नहीं होती।

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि चीन बांग्लादेश में कितना निवेश करेगा, बल्कि यह है कि भारत अपनी पड़ोसी नीति को कितना प्रभावी और आकर्षक बना पाता है। यदि भारत संपर्क परियोजनाओं, व्यापारिक सुविधाओं, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को गति देता है तो उसकी स्थिति स्वाभाविक रूप से मजबूत बनी रहेगी।

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भारत को इस मुलाकात को चिंता के बजाय एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखना चाहिए। दक्षिण एशिया में प्रभाव केवल सैन्य या राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि आर्थिक साझेदारी, विश्वसनीयता और दीर्घकालिक सहयोग से तय होगा। भारत के पास इन तीनों क्षेत्रों में मजबूत आधार मौजूद है।

बांग्लादेश आज दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे में भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग जितना मजबूत होगा, उतना ही क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास को लाभ मिलेगा। दूसरी ओर चीन भी इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। यह प्रतिस्पर्धा यदि विकास और निवेश पर केंद्रित रहे तो पूरे क्षेत्र के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।

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भारत को आत्मविश्वास के साथ अपनी पड़ोसी नीति को आगे बढ़ाना चाहिए। चीन और बांग्लादेश की यह मुलाकात एक कूटनीतिक घटना है, लेकिन भारत की दीर्घकालिक रणनीति का निर्धारण किसी एक बैठक से नहीं, बल्कि उसके अपने आर्थिक, सामरिक और क्षेत्रीय हितों से होगा।

दक्षिण एशिया के बदलते परिदृश्य में भारत के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि पड़ोस में भरोसा, संपर्क और विकास की राजनीति को और मजबूत किया जाए। यही भारत की वास्तविक रणनीतिक ताकत है।
(*यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विश्लेषण पर आधारित संपादकीय है। इसमें व्यक्त विचार आवश्यक नहीं कि सभी पाठकों या संस्थाओं के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हों।)

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