एक दर्जन भाइयों के रहते बेटी ने दी पिता की चिता को मुखाग्नि, नम्रता के फैसले ने समाज से पूछाकृबेटियों के अधिकारों पर पहरा कब तक?

औरैया में बेटी ने दी पिता की चिता को मुखाग्नि, नम्रता की पहल ने बदली सोच

औरैया के जमौली गांव में नम्रता और मीनाक्षी ने पिता की अर्थी को दिया कंधा, बड़ी बेटी ने निभाया अंतिम संस्कार का दायित्व; भाइयों और बड़ी मांओं ने साथ देकर दिया बेटा-बेटी में भेद मिटाने का संदेश

एस.वी.सिंह। पत्रकार सत्ता
औरैया। पिता की अर्थी सामने थी, आंखों में बिछड़ने का असहनीय दर्द था और चारों ओर अपनों की भीड़। परिवार में एक दर्जन से अधिक भाई, भतीजे और दूसरे पुरुष सदस्य मौजूद थे। परंपरा के मुताबिक पिता की चिता को मुखाग्नि देने के लिए कई पुरुष रिश्तेदार आगे आ सकते थे, लेकिन इस बार परिवार की बेटी ने आगे बढ़कर वह जिम्मेदारी अपने हाथों में ली, जिसे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी केवल बेटे का अधिकार मानता है। औरैया जनपद के जमौली गांव में नम्रता और मीनाक्षी ने न केवल अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, बल्कि बड़ी बेटी नम्रता ने चिता को मुखाग्नि देकर एक ऐसे सामाजिक भेदभाव पर सवाल खड़ा किया, जो आज भी बेटियों के अधिकारों के रास्ते में खड़ा दिखाई देता है।

यह घटना केवल एक परिवार में हुए अंतिम संस्कार की कहानी नहीं है। यह उस सोच को बदलने की पहल है, जिसमें बेटी को परिवार का अभिन्न हिस्सा तो माना जाता है, लेकिन कई महत्वपूर्ण अवसरों पर उसे बेटे के बराबर अधिकार देने से परहेज किया जाता है। नम्रता के इस फैसले ने समाज के सामने सवाल रखा है कि जब बेटी अपने माता-पिता के सुख-दुख में बराबर की भागीदार है, तो उनके अंतिम संस्कार का अधिकार उसे देने में संकोच क्यों?

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पिता के निधन के बाद बेटी ने लिया आगे आने का फैसला

इटावा के जाने-माने सर्राफा व्यवसायी रहे स्वं रामगोपाल के सबसे छोटे बेटे सुधीर सिंह औरैया के जमौली गांव में रहने लगे थे। गुरुवार शाम उनका निधन हो गया। उनके परिवार में दो बेटियां नम्रता और मीनाक्षी हैं। पिता के निधन की खबर के बाद अलग-अलग शहरों में रह रहे परिजन गांव पहुंचे। घर में शोक का माहौल था। इसी बीच अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी को लेकर चर्चा होने लगी। परिवार में कई भतीजे और अन्य पुरुष सदस्य मौजूद थे, जो अंतिम संस्कार की रस्में निभाने के इच्छुक थे।
लेकिन सुधीर सिंह की बड़ी बेटी नम्रता ने आगे आकर स्वयं अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने की इच्छा जाहिर की। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि समाज में आज भी इस विषय को लेकर कई तरह की धारणाएं मौजूद हैं। नम्रता के प्रस्ताव को उनके भाइयों और बड़ी मांओं ने सहर्ष स्वीकार किया। परिवार के सदस्यों के इस समर्थन ने बेटी के अधिकार और सम्मान के पक्ष में एक महत्वपूर्ण संदेश दिया।

बेटी ने अर्थी को कंधा दिया, मुखाग्नि के बाद निभाई कपाल क्रिया की रस्म

शुक्रवार को अंतिम संस्कार के दौरान नम्रता और मीनाक्षी ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया। इसके बाद बड़ी बेटी नम्रता ने विधिवत पिता की चिता को मुखाग्नि दी और कपाल क्रिया की रस्म भी निभाई। पिता को अंतिम विदाई देते समय दोनों बेटियों की आंखों में आंसू थे, लेकिन नम्रता का फैसला इस बात का प्रतीक बन गया कि बेटी का प्रेम, कर्तव्य और जिम्मेदारी किसी भी मायने में बेटे से कम नहीं है।
इस दौरान कुछ ग्रामीणों और रिश्तेदारों की ओर से बेटी द्वारा मुखाग्नि दिए जाने पर आपत्ति भी जताई गई। हालांकि, परिवार के भाइयों ने नम्रता के फैसले का समर्थन किया और विरोध के स्वरों को आगे नहीं बढ़ने दिया। परिवार के इस रुख ने स्पष्ट किया कि बदलाव की शुरुआत घर से होती है। जब अपने ही लोग बेटी के साथ खड़े होते हैं, तो पुरानी धारणाओं को चुनौती देना आसान हो जाता है।

दुख की घड़ी में बहन ने ऐसा कदम उठाया, जिस पर हमें गर्व है

पिता के अंतिम संस्कार के बाद नम्रता के भाई देवेश सिंह उर्फ पिंटू ने अपनी बहन के फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा कि परिवार इस समय गहरे दुख से गुजर रहा है, लेकिन उनकी बहन ने जो पहल की है, उस पर उन्हें गर्व है। उनके समर्थन ने यह संदेश दिया कि बेटी के अधिकारों को स्वीकार करने के लिए केवल सामाजिक बहस नहीं, बल्कि परिवार के भीतर समानता की भावना भी जरूरी है।

नम्रता के भड़े भाई देवेश सिंह उर्फ पिंटू
नम्रता के भड़े भाई देवेश सिंह उर्फ पिंटू।

नम्रता की बड़ी मां कमला देवी ने भी अपनी भतीजी के साहस की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि उनके परिवार में पहले से ही बेटे और बेटी के बीच भेदभाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता रहा है। हालांकि, परिवार और क्षेत्र में पहली बार किसी बेटी द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि दिए जाने का यह अवसर उनके लिए विशेष है। उन्हें गर्व है कि उनके परिवार से ऐसी पहल शुरू हुई।

नम्रता की बड़ी मां कमला देवी।

बदलाव तब पूरा होगा, जब सगे भाइयों के रहते भी बेटी को मिले बराबर अधिकार

इस घटना को लेकर परिवार की सदस्य लवली उर्फ प्रियंका ने सामाजिक बदलाव के एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने अपनी छोटी बहन के साहस और धैर्य की सराहना करते हुए कहा कि अभी इस बदलाव की यात्रा अधूरी है। उनके चाचा की दो बेटियां थीं, इसलिए नम्रता का आगे आना उस पुरानी सोच को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें बेटे की अनुपस्थिति में ही बेटी को यह जिम्मेदारी निभाने का अवसर दिया जाता है।
पेशे से शिक्षिका प्रियंका उर्फ लवली, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख भी लिखती रहती हैं। उनका मानना है कि असली सामाजिक बदलाव तब दिखाई देगा, जब परिवार में सगे भाई मौजूद होने के बावजूद बेटियों को भी अपनी इच्छा और पारिवारिक सहमति के अनुसार अंतिम संस्कार की रस्में निभाने का समान अवसर मिले। उनका यह विचार समाज के सामने एक बड़ा सवाल रखता है- क्या बेटी के अधिकार इस बात पर निर्भर होने चाहिए कि परिवार में बेटा मौजूद है या नहीं?

नम्रता की बड़ी बहन प्रियंका उर्फ लवली।

दुख की घड़ी में परिवार बना बेटियों की ताकत

पिता को खोने के दुख से गुजर रहीं नम्रता और मीनाक्षी को संभालने के लिए परिवार के अनेक सदस्य मौजूद रहे। उनकी बड़ी मांएं रामवती और कमला देवी, बड़ी बहनें सरोजनी और सरिता, भाई मान सिंह, प्रदीप, आलोक, देवेश और राहुल के साथ ही परिवार की बहुएं सुनीता सिंह, पूनम, लीना, संजू और रेखा ने दोनों बेटियों का साथ दिया। उनकी नानी बिटानी देवी तथा मामा विश्वनाथ सिंह और रविन्द्र सिंह ने भी नम्रता की पहल की सराहना की।

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यह साथ बताता है कि परंपराओं में बदलाव का अर्थ परिवार से टकराव नहीं, बल्कि परिवार के सहयोग से समानता का रास्ता खोलना भी हो सकता है। यदि घर के सदस्य बेटी के फैसले का सम्मान करें, तो समाज की रूढ़ियों को चुनौती देने वाली बेटियों को अकेले संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

नम्रता की पहल ने समाज के सामने छोड़ा बड़ा सवाल

जमौली गांव की इस घटना को लेकर क्षेत्र में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे उस सामाजिक सोच का परिणाम मान रहे हैं, जिसमें बेटियों के अधिकारों को लेकर अब भी संकोच और आपत्तियां दिखाई देती हैं। वहीं, दूसरे लोग इसे बदलाव की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में देख रहे हैं।

नम्रता और मीनाक्षी की यह पहल समाज को सोचने के लिए मजबूर करती है कि बेटी को जन्म से लेकर शिक्षा, संपत्ति, निर्णय और पारिवारिक जिम्मेदारियों तक समान अधिकार देने की बात तभी सार्थक होगी, जब व्यवहार में भी उसे बराबरी मिलेगी। बेटी केवल किसी परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उस परिवार की उत्तराधिकारी, सहारा और सम्मान की समान हकदार भी है।

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संदेश स्पष्ट है—बेटा और बेटी के बीच अधिकारों का अंतर खत्म किए बिना समानता की बात अधूरी है। माता-पिता के प्रति प्रेम और कर्तव्य का कोई एक लिंग नहीं होता। नम्रता ने अपने पिता को अंतिम विदाई देकर जो पहल की, वह दूसरे परिवारों को भी यह सोचने का अवसर देती है कि परंपराओं का सम्मान करते हुए भी भेदभावपूर्ण धारणाओं को बदला जा सकता है। बेटियों को उनका अधिकार देने के लिए हर बार किसी बड़े आंदोलन की जरूरत नहीं होती; कभी-कभी परिवार के भीतर लिया गया एक साहसी फैसला भी समाज को आईना दिखा देता है।

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